Darpan
Darpan
Ghazal

इस क़दर भी हो तू दरियादिल कभी

डूबते को हाथ दे साहिल कभी

तू बहुत छोटी है इनसे उम्र में
रास्तों के पैर छू मंज़िल कभी

महफ़िलों में सब इशारे हो गए
अब अकेले में भी मुझ से मिल कभी

ज़ुल्फ़ अपनी बाँध कर रखती है वो
क़त्ल करती ही नहीं क़ातिल कभी

ख़ाक हूँ गर मैं तो तू भी ख़ाक हो
फूल है गर तू तो मुझ
में खिल कभी

ज़िन्दगी सब से महँगी चीज़ है
भर नहीं पाया मैं इस का बिल कभी

एक ग़म फिर एक ग़म फिर एक ग़म
तुम नहीं समझोगे ये मुश्किल कभी

— Darpan

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