इस क़दर भी हो तू दरियादिल कभी
डूबते को हाथ दे साहिल कभी
तू बहुत छोटी है इनसे 'उम्र में
रास्तों के पैर छू मंज़िल कभी
महफ़िलों में सब इशारे हो गए
अब अकेले में भी मुझ सेे मिल कभी
ज़ुल्फ़ अपनी बाँध कर रखती है वो
क़त्ल करती ही नहीं क़ातिल कभी
ख़ाक हूँ गर मैं तो तू भी ख़ाक हो
फूल है गर तू तो मुझ
में खिल कभी
ज़िन्दगी सब सेे महँगी चीज़ है
भर नहीं पाया मैं इसका बिल कभी
एक ग़म फिर एक ग़म फिर एक ग़म
तुम नहीं समझोगे ये मुश्किल कभी
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